श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 91: महर्षि लोमशका आगमन और युधिष्ठिरसे अर्जुनके पाशुपत आदि दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिका वर्णन तथा इन्द्रका संदेश सुनाना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  3.91.1-2 
वैशम्पायन उवाच
एवं सम्भाषमाणे तु धौम्ये कौरवनन्दन।
लोमश: स महातेजा ऋषिस्तत्राजगाम ह॥ १॥
तं पाण्डवाग्रजो राजा सगणो ब्राह्मणाश्च ते।
उपातिष्ठन्महाभागं दिवि शक्रमिवामरा:॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - हे कौरवपुत्र! जब धौम्य ऋषि इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय महाप्रतापी लोमश ऋषि वहाँ पधारे। जैसे स्वर्ग में इन्द्र के आने पर सब देवता खड़े हो जाते हैं, उसी प्रकार ज्येष्ठ पाण्डवराज युधिष्ठिर, उनके समुदाय के अन्य लोग तथा वे ब्राह्मण भी महापुरुष लोमश को आते देखकर उनके स्वागत के लिए खड़े हो गए।॥1-2॥
 
Vaishampayana says - O son of Kauravas! When sage Dhoumya was speaking thus, at that very time the very illustrious sage Lomash came there. Just as all the gods stand up when Indra arrives in heaven, in the same way the eldest Pandava king Yudhishthira, other people of his community and those Brahmins also stood up to welcome the great man Lomash on seeing him coming.॥1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)