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mahabharat 3.90.1-2: धौम्यजी कहते हैं - नृपश्रेष्ठ! मैं आपको उत्तर दिशा के पवित्र तीर्थस्थानों और देवालयों का वर्णन करता हूँ। प्रभु! आप सावधान होकर मुझसे वह सब सुनें। वीर! तीर्थों की कथा का प्रसंग उनके प्रति शुभ श्रद्धा उत्पन्न करने वाला है। 1-2॥   |   mahabharat अध्याय 3.90: धौम्यद्वारा उत्तर दिशाके तीर्थोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 90: धौम्यद्वारा उत्तर दिशाके तीर्थोंका वर्णन  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  3.90.1-2 
धौम्य उवाच
उदीच्यां राजशार्दूल दिशि पुण्यानि यानि वै।
तानि ते कीर्तयिष्यामि पुण्यान्यायतनानि च॥ १॥
शृणुष्वावहितो भूत्वा मम मन्त्रयत: प्रभो।
कथाप्रतिग्रहो वीर श्रद्धां जनयते शुभाम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
धौम्यजी कहते हैं - नृपश्रेष्ठ! मैं आपको उत्तर दिशा के पवित्र तीर्थस्थानों और देवालयों का वर्णन करता हूँ। प्रभु! आप सावधान होकर मुझसे वह सब सुनें। वीर! तीर्थों की कथा का प्रसंग उनके प्रति शुभ श्रद्धा उत्पन्न करने वाला है। 1-2॥
 
Dhaumyaji says – Nripashrestha! Let me describe to you the sacred places of pilgrimage and temples in the north. Lord! You be careful and listen to all that from me. Brave! The context of the story of pilgrims generates auspicious reverence towards them. 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)