श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 9: व्यासजीके द्वारा सुरभि और इन्द्रके उपाख्यानका वर्णन तथा उनका पाण्डवोंके प्रति दया दिखलाना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.9.22 
कथं जीवेयुरत्यन्तं कथं वर्धेयुरित्यपि।
इति दीनेषु पार्थेषु मनो मे परितप्यते॥ २२॥
 
 
अनुवाद
‘वे कैसे जीवित रहेंगे और कैसे बढ़ेंगे?’ उन दुखी कुन्तीपुत्रों का विचार करके मेरा मन अत्यन्त दुःखी हो जाता है ॥22॥
 
'How will they survive and grow?' Thinking about those miserable sons of Kunti, my mind becomes very sad. ॥22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)