श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 9: व्यासजीके द्वारा सुरभि और इन्द्रके उपाख्यानका वर्णन तथा उनका पाण्डवोंके प्रति दया दिखलाना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.9.16 
सुरभिरुवाच
यदि पुत्रसहस्राणि सर्वत्र समतैव मे।
दीनस्य तु सत: शक्र पुत्रस्याभ्यधिका कृपा॥ १६॥
 
 
अनुवाद
सुरभि बोली - देवेन्द्र! मेरे हजारों पुत्र हों तो भी मैं उन सबके प्रति समान भाव रखती हूँ; किन्तु दीन-दुखी पुत्र पर मुझे अधिक दया आती है।
 
Surabhi said - Devendra! If I have thousands of sons, I treat all of them equally; but I feel more compassion for a poor and miserable son.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)