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mahabharat 3.89.9-10: शत्रुओं की राजधानी को जीतने वाले राजा! राजर्षि विश्वामित्र की तपस्या से प्रकट हुई एक पवित्र नदी है, जो परम पवित्र तीर्थस्थान मानी जाती है। इसी के तट पर नहुषनंदन राजा ययाति ऋषियों के बीच स्वर्ग से गिरकर पुनः सनातन धर्मावलंबी लोकों में चले गए थे। 9-10॥   |   mahabharat अध्याय 3.89: धौम्यद्वारा पश्चिम दिशाके तीर्थोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 89: धौम्यद्वारा पश्चिम दिशाके तीर्थोंका वर्णन  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  3.89.9-10 
ह्रदिनी पुण्यतीर्था च राजर्षेस्तत्र वै सरित्।
विश्वामित्रनदी राजन् पुण्या परपुरंजय॥ ९॥
यस्यास्तीरे सतां मध्ये ययातिर्नहुषात्मज:।
पपात स पुनर्लोकाँल्लेभे धर्मान् सनातनान्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
शत्रुओं की राजधानी को जीतने वाले राजा! राजर्षि विश्वामित्र की तपस्या से प्रकट हुई एक पवित्र नदी है, जो परम पवित्र तीर्थस्थान मानी जाती है। इसी के तट पर नहुषनंदन राजा ययाति ऋषियों के बीच स्वर्ग से गिरकर पुनः सनातन धर्मावलंबी लोकों में चले गए थे। 9-10॥
 
The king who conquered the enemies' capital! There is a sacred river that appeared due to the penance of Rajarishi Vishwamitra, which is considered to be the most sacred place of pilgrimage. On its banks, Nahushanandan King Yayati had fallen from heaven among the sages and had again gone to the worlds of eternal religion. 9-10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)