श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 89: धौम्यद्वारा पश्चिम दिशाके तीर्थोंका वर्णन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.89.18 
मनसाप्यभिकामस्य पुष्कराणि मनस्विन:।
विप्रणश्यन्ति पापानि नाकपृष्ठे च मोदते॥ १८॥
 
 
अनुवाद
जो दृढ़ इच्छाशक्ति वाला मनुष्य मन में भी पुष्कर तीर्थ में निवास करने की इच्छा रखता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और वह स्वर्ग का सुख भोगता है। ॥18॥
 
"A man of strong will who even in his mind desires to reside at Pushkar Tirtha, all his sins are destroyed and he enjoys the bliss of heaven." ॥18॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि धौम्यतीर्थयात्रायां एकोननवतितमोऽध्याय:॥ ८९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें धौम्यतीर्थयात्राविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८९॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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