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mahabharat 3.89.14-15: राजन! दूसरी ओर केतुमाल, मेध्य और गंगाद्वार (हरिद्वार) ये परम पवित्र तीर्थस्थल हैं, जो सदैव तपस्वियों से भरे रहते हैं। भूपाल! द्विजनों द्वारा सेवित प्रसिद्ध संधवारण्य भी वहीं है।   |   mahabharat अध्याय 3.89: धौम्यद्वारा पश्चिम दिशाके तीर्थोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 89: धौम्यद्वारा पश्चिम दिशाके तीर्थोंका वर्णन  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  3.89.14-15 
तत: पुण्यतमा राजन् सततं तापसैर्युता॥ १४॥
केतुमाला च मेध्या च गङ्गाद्वारं च भूमिप।
ख्यातं च सैन्धवारण्यं पुण्यं द्विजनिषेवितम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
राजन! दूसरी ओर केतुमाल, मेध्य और गंगाद्वार (हरिद्वार) ये परम पवित्र तीर्थस्थल हैं, जो सदैव तपस्वियों से भरे रहते हैं। भूपाल! द्विजनों द्वारा सेवित प्रसिद्ध संधवारण्य भी वहीं है।
 
Rajan! On the other side, there are the most sacred places of pilgrimage – Ketumala, Medhya and Gangadwar (Haridwar), always filled with ascetics. Bhupal! The famous Sandhvaranya served by Dwijans is also there.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)