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mahabharat 3.88.21: वहाँ पिण्डारक नामक तीर्थ है, जो तपस्वियों द्वारा सेवित है और शुभ है। दूसरी ओर उज्जयन्त नामक महान पर्वत है, जो शीघ्र सिद्धि प्रदान करने वाला है।   |   mahabharat अध्याय 3.88: धौम्यमुनिके द्वारा दक्षिण दिशावर्ती तीर्थोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 88: धौम्यमुनिके द्वारा दक्षिण दिशावर्ती तीर्थोंका वर्णन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.88.21 
तत्र पिण्डारकं नाम तापसाचरितं शिवम्।
उज्जयन्तश्च शिखरी क्षिप्रं सिद्धिकरो महान्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
वहाँ पिण्डारक नामक तीर्थ है, जो तपस्वियों द्वारा सेवित है और शुभ है। दूसरी ओर उज्जयन्त नामक महान पर्वत है, जो शीघ्र सिद्धि प्रदान करने वाला है।
 
There is a pilgrimage place called Pindarak which is served by ascetics and is auspicious. On the other side is a great mountain called Ujjayanta which grants success quickly.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)