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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 88: धौम्यमुनिके द्वारा दक्षिण दिशावर्ती तीर्थोंका वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.88.1 
धौम्य उवाच
दक्षिणस्यां तु पुण्यानि शृणु तीर्थानि भारत।
विस्तरेण यथाबुद्धि कीर्त्यमानानि तानि वै॥ १॥
 
 
अनुवाद
धौम्यजी कहते हैं - भरतवंशी युधिष्ठिर! अब मैं अपनी बुद्धि के अनुसार दक्षिण दिशा के तीर्थों का विस्तारपूर्वक वर्णन करता हूँ, सुनो - 1॥
 
Dhaumyaji says – Bharatvanshi Yudhishthir! Now, according to my wisdom, I describe in detail the pilgrimages to the south, listen - 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)