Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.87.1-2: वैशम्पायन कहते हैं- जनमेजय! पाण्डवों के हृदय में अर्जुन के लिए अत्यन्त शोक हो रहा था। वे सभी उससे मिलने के लिए आतुर थे। उनकी यह दशा देखकर बृहस्पति के समान तेजस्वी महर्षि धौम्य ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा- 'हे पापों से मुक्त भरतपुत्र! सुनो, मैं उन पवित्र आश्रमों, दिशाओं, तीर्थों और पर्वतों का वर्णन करता हूँ, जो ब्राह्मणों द्वारा पूजित हैं।' | mahabharat अध्याय 3.87: धौम्यद्वारा पूर्वदिशाके तीर्थोंका वर्णन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
वैशम्पायन कहते हैं- जनमेजय! पाण्डवों के हृदय में अर्जुन के लिए अत्यन्त शोक हो रहा था। वे सभी उससे मिलने के लिए आतुर थे। उनकी यह दशा देखकर बृहस्पति के समान तेजस्वी महर्षि धौम्य ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा- 'हे पापों से मुक्त भरतपुत्र! सुनो, मैं उन पवित्र आश्रमों, दिशाओं, तीर्थों और पर्वतों का वर्णन करता हूँ, जो ब्राह्मणों द्वारा पूजित हैं।'
Vaishampayana says- Janamejaya! The hearts of the Pandavas were feeling very sad for Arjun. All of them were eager to meet him. Seeing their condition, Maharishi Dhoumya, who was as radiant as Brihaspati, consoled them and said- 'O Bharat's son, who is free from sins! Listen, I am describing those holy ashrams, directions, pilgrimages and mountains which are respected by Brahmins.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥