श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 86: युधिष्ठिरका धौम्य मुनिसे पुण्य तपोवन, आश्रम एवं नदी आदिके विषयमें पूछना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  3.86.3 
स हि वीरोऽनुरक्तश्च समर्थश्च तपोधन:।
कृती च भृशमप्यस्त्रे वासुदेव इव प्रभु:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वह वीर पुरुष मुझमें प्रेम रखता है, बलवान है, तपस्वी है, पवित्रात्मा है और अस्त्रविद्या में भगवान श्रीकृष्ण के समान प्रभावशाली है॥3॥
 
'That brave man has love for me, is powerful, has penance, has a pious soul and is as impressive as Lord Krishna in his knowledge of weapons. 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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