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mahabharat 3.86.20-21: 'ब्राह्मण! कृपया हमें विभिन्न आश्रमों, सरोवरों, नदियों और सुन्दर पर्वतों के पते बताइए, जो आपने अन्य ब्राह्मणों से सुने हैं। हमें अर्जुन के बिना काम्यक वन में रहना अच्छा नहीं लगता; अतः अब हम दूसरी दिशा में चलेंगे।'   |   mahabharat अध्याय 3.86: युधिष्ठिरका धौम्य मुनिसे पुण्य तपोवन, आश्रम एवं नदी आदिके विषयमें पूछना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 86: युधिष्ठिरका धौम्य मुनिसे पुण्य तपोवन, आश्रम एवं नदी आदिके विषयमें पूछना  »  श्लोक 20-21
 
 
श्लोक  3.86.20-21 
विविधानाश्रमान् कांश्चिद् द्विजातिभ्य: प्रतिश्रुतान्।
सरांसि सरितश्चैव रमणीयांश्च पर्वतान्॥ २०॥
आचक्ष्व न हि मे ब्रह्मन् रोचते तमृतेऽर्जुनम्।
वनेऽस्मिन् काम्यके वासो गच्छामोऽन्यां दिशं प्रति॥ २१॥
 
 
अनुवाद
'ब्राह्मण! कृपया हमें विभिन्न आश्रमों, सरोवरों, नदियों और सुन्दर पर्वतों के पते बताइए, जो आपने अन्य ब्राह्मणों से सुने हैं। हमें अर्जुन के बिना काम्यक वन में रहना अच्छा नहीं लगता; अतः अब हम दूसरी दिशा में चलेंगे।'
 
‘Brahmin! Please tell us the addresses of various ashrams, lakes, rivers and beautiful mountains that you have heard from other Brahmins. We do not like staying in Kamyak forest without Arjuna; hence we will now move in another direction.'
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि धौम्यतीर्थयात्रायां षडशीतितमोऽध्याय:॥ ८६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें धौम्यकी तीर्थयात्राविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८६॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)