श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 86: युधिष्ठिरका धौम्य मुनिसे पुण्य तपोवन, आश्रम एवं नदी आदिके विषयमें पूछना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.86.2 
मया स पुरुषव्याघ्रो जिष्णु: सत्यपराक्रम:।
अस्त्रहेतोर्महाबाहुरमितात्मा विवासित:॥ २॥
 
 
अनुवाद
'ब्रह्म! मैंने उस अस्त्र को प्राप्त करने के लिए विजयी, सत्य, पराक्रमी, महान् और यशस्वी पुरुष, महाबाहु सिंह अर्जुन को वनवास दे दिया है।'
 
'Brahman! I have exiled Arjun, the victorious, true, mighty, great and glorious man, the mighty-armed lion, for the sake of obtaining the weapon. 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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