श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 86: युधिष्ठिरका धौम्य मुनिसे पुण्य तपोवन, आश्रम एवं नदी आदिके विषयमें पूछना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.86.18 
भवानन्यद् वनं साधु बह्वन्नं फलवच्छुचि।
आख्यातु रमणीयं च सेवितं पुण्यकर्मभि:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
अतः आप कृपा करके हमें उस सुन्दर वन का पता बताइए जो अत्यन्त उत्तम, पवित्र, प्रचुर अन्न और फलों से युक्त तथा पुण्यवान पुरुषों से सेवित हो।॥18॥
 
‘Therefore please tell us the address of a beautiful forest which is very good, sacred, full of abundant food and fruits and served by virtuous men.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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