श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 86: युधिष्ठिरका धौम्य मुनिसे पुण्य तपोवन, आश्रम एवं नदी आदिके विषयमें पूछना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.86.17 
वयं तु तमृते वीरं वनेऽस्मिन् द्विपदां वर।
अवधानं न गच्छाम: काम्यके सह कृष्णया॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'नरश्रेष्ठ! द्रौपदी सहित हम सभी पाण्डवों को वीर अर्जुन के बिना इस काम्यकवन में मन नहीं लगता। 17॥
 
'Narshrestha! All of us Pandavas including Draupadi do not feel like doing this Kamyakavan without the brave Arjun. 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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