श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 86: युधिष्ठिरका धौम्य मुनिसे पुण्य तपोवन, आश्रम एवं नदी आदिके विषयमें पूछना  »  श्लोक 12-14
 
 
श्लोक  3.86.12-14 
तं स कृष्णानिलोद्‍धूतो दिव्यास्त्रज्वलनो महान्।
श्वेतवाजिबलाकाभृद् गाण्डीवेन्द्रायुधोल्बण:॥ १२॥
संरब्ध: शरधाराभि: सुदीप्तं कर्णपावकम्।
अर्जुनोदीरितो मेघ: शमयिष्यति संयुगे॥ १३॥
स साक्षादेव सर्वाणि शक्रात् परपुरंजय:।
दिव्यान्यस्त्राणि बीभत्सुस्ततश्च प्रतिपत्स्यते॥ १४॥
 
 
अनुवाद
'युद्ध में उस अग्नि को केवल अर्जुन नामक महान मेघ ही बुझा सकता है। वह मेघ श्रीकृष्ण रूपी वायु के सहारे ही उठेगा। दिव्यास्त्रों का प्रकाश उसमें बिजली की चमक के समान होगा। रथ के श्वेत घोड़े उसके पास उड़ते हुए सारसों की पंक्तियों के समान सुशोभित होंगे। गाण्डीव धनुष इन्द्रधनुष के समान भयंकर दृश्य प्रस्तुत करेगा। क्रोध में भरकर वह बाण रूपी जलधारा से कर्ण की प्रज्वलित अग्नि को अवश्य बुझा देगा। शत्रुओं की राजधानी को जीतने वाला अर्जुन, इन्द्र से सीधे ही समस्त दिव्यास्त्र प्राप्त करेगा।' 12-14
 
‘Only the great cloud named Arjuna can extinguish that fire in the war. That cloud will rise only with the support of the wind in the form of Shri Krishna. The light of the divine weapons will be the flash of lightning in it. The white horses of the chariot will be decorated like the rows of cranes flying near it. The bow of Gandiva will present a fearful sight like the rainbow. Filled with anger, he will definitely extinguish the blazing fire of Karna with the stream of water in the form of an arrow. Arjuna, who conquers the capital of the enemies, will receive all the divine weapons directly from Indra. 12-14.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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