श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 86: युधिष्ठिरका धौम्य मुनिसे पुण्य तपोवन, आश्रम एवं नदी आदिके विषयमें पूछना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.86.1 
वैशम्पायन उवाच
भ्रातॄणां मतमाज्ञाय नारदस्य च धीमत:।
पितामहसमं धौम्यं प्राह राजा युधिष्ठिर:॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं: जनमेजय! अपने भाइयों और महाज्ञानी नारद मुनि से परामर्श लेकर राजा युधिष्ठिर ने अपने पितामह के समान प्रभावशाली पुरोहित धौम्य से कहा -॥1॥
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! After taking the advice of his brothers and the wisest sage Narada, king Yudhishthira said to the priest Dhoumya, who was as influential as his grandfather -॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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