vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य
»
श्लोक 95
श्लोक
3.85.95
यथा पुण्यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च।
उपास्य पुण्यं लब्ध्वा च भवत्यमरलोकभाक्॥ ९५॥
अनुवाद
सम्पूर्ण तीर्थस्थानों और समस्त पवित्र देवालयों की पूजा करके पुण्य अर्जित करके मनुष्य स्वर्गलोक का भागी बनता है ॥95॥
By earning merits by worshipping all the holy places of pilgrimage and all the holy temples, a man becomes a sharer in the heavenly world. ॥ 95॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×