श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  3.85.95 
यथा पुण्यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च।
उपास्य पुण्यं लब्ध्वा च भवत्यमरलोकभाक्॥ ९५॥
 
 
अनुवाद
सम्पूर्ण तीर्थस्थानों और समस्त पवित्र देवालयों की पूजा करके पुण्य अर्जित करके मनुष्य स्वर्गलोक का भागी बनता है ॥95॥
 
By earning merits by worshipping all the holy places of pilgrimage and all the holy temples, a man becomes a sharer in the heavenly world. ॥ 95॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)