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mahabharat 3.85.94: राजन! जब तक किसी मनुष्य की हड्डी गंगाजल का स्पर्श करती है, तब तक वह मनुष्य स्वर्ग में पूजित होता है॥94॥   |   mahabharat अध्याय 3.85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य  »  श्लोक 94
 
 
श्लोक  3.85.94 
यावदस्थि मनुष्यस्य गङ्गाया: स्पृशते जलम्।
तावत् स पुरुषो राजन् स्वर्गलोके महीयते॥ ९४॥
 
 
अनुवाद
राजन! जब तक किसी मनुष्य की हड्डी गंगाजल का स्पर्श करती है, तब तक वह मनुष्य स्वर्ग में पूजित होता है॥94॥
 
Rajan! As long as a man's bone touches the water of Ganga, that man is worshiped in heaven. 94॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)