श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  3.85.93 
पुनाति कीर्तिता पापं दृष्टा भद्रं प्रयच्छति।
अवगाढा च पीता च पुनात्यासप्तमं कुलम्॥ ९३॥
 
 
अनुवाद
गंगाजी का नाम लेने से वे सब पापों को धोकर पवित्र कर देती हैं, उनके दर्शन करने से कल्याण होता है और उनसे स्नान करने तथा उनका जल पीने से सात पीढ़ियाँ पवित्र हो जाती हैं॥ 93॥
 
If the name of Gangaji is taken, it washes away all sins and purifies one. On seeing it, it bestows welfare and on taking bath and drinking water from it, it purifies seven generations of a person.॥ 93॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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