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mahabharat 3.85.66-67h: हे महाबाहु! उस तीर्थ में स्नान करने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए एकाग्रचित्त होकर गंगा में स्नान करने से मनुष्य पाप मुक्त हो जाता है और वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त करता है। 66 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य  »  श्लोक 66-67h
 
 
श्लोक  3.85.66-67h 
तस्मिंस्तीर्थे महाबाहो स्नात्वा पापै: प्रमुच्यते।
गङ्गायां तु नर: स्नात्वा ब्रह्मचारी समाहित:॥ ६६॥
विधूतपाप्मा भवति वाजपेयं च विन्दति।
 
 
अनुवाद
हे महाबाहु! उस तीर्थ में स्नान करने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए एकाग्रचित्त होकर गंगा में स्नान करने से मनुष्य पाप मुक्त हो जाता है और वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त करता है। 66 1/2॥
 
Great arms! By taking bath in that pilgrimage a person becomes free from all sins. By observing celibacy and concentrating, taking a bath in the Ganges, a person becomes sin-free and gets the fruits of Vajpayee Yagya. 66 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)