श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  3.85.63 
तत्र कूपे महाराज विश्रुता भरतर्षभ।
समुद्रास्तत्र चत्वारो निवसन्ति युधिष्ठिर॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
भरतकुल के रत्न महाराज युधिष्ठिर, वहाँ एक कुआँ है जिसमें चारों समुद्र निवास करते हैं ॥63॥
 
Maharaja Yudhishthira, the jewel of the Bharata clan, there is a well in which all the four oceans reside. ॥ 63॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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