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mahabharat 3.85.53: हे श्रेष्ठ! उस तुंगकारण्य में प्रवेश करते ही, स्त्री-पुरुष सभी के पाप नष्ट हो जाते हैं ॥53॥   |   mahabharat अध्याय 3.85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  3.85.53 
तदरण्यं प्रविष्टस्य तुङ्गकं राजसत्तम।
पापं प्रणश्यत्यखिलं स्त्रियो वा पुरुषस्य वा॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
हे श्रेष्ठ! उस तुंगकारण्य में प्रवेश करते ही, स्त्री-पुरुष सभी के पाप नष्ट हो जाते हैं ॥53॥
 
The best! As soon as one enters that Tungkaranya, the sins of everyone, man or woman, are destroyed. 53॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)