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mahabharat 3.85.46: तुम तुंगकारण्य में जाकर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए अपनी इन्द्रियों को वश में रखो। प्राचीन काल में सारस्वत ऋषि ने वहाँ अन्य ऋषियों को वेदों का अध्ययन कराया था। 46॥   |   mahabharat अध्याय 3.85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  3.85.46 
तुङ्गकारण्यमासाद्य ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय:।
वेदानध्यापयत् तत्र ऋषि: सारस्वत: पुरा॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
तुम तुंगकारण्य में जाकर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए अपनी इन्द्रियों को वश में रखो। प्राचीन काल में सारस्वत ऋषि ने वहाँ अन्य ऋषियों को वेदों का अध्ययन कराया था। 46॥
 
Go to Tungkaranya and keep your senses under your control while practicing celibacy. In ancient times, Rishi Saraswat had made other sages study the Vedas there. 46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)