श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  3.85.45 
ततो देवपथं गत्वा नियतो नियताशन:।
देवसत्रस्य यत् पुण्यं तदेवाप्नोति मानव:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् जो मनुष्य नियमपूर्वक आहार-विहार करता है, वह भगवान् के मार्ग पर चलता है और देवसत्र का पुण्य प्राप्त करता है ॥ 45॥
 
Thereafter, a person who follows the rules and takes regular diet goes on the path of God and attains the virtue of Devsatra. ॥ 45॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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