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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य
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श्लोक 42
श्लोक
3.85.42
शरभङ्गाश्रमं गत्वा शुकस्य च महात्मन:।
न दुर्गतिमवाप्नोति पुनाति च कुलं नर:॥ ४२॥
अनुवाद
शरभंग ऋषि और महात्मा शुक के आश्रमों में जाकर मनुष्य कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता और अपने कुल को पवित्र कर लेता है ॥ 42॥
By going to the hermitages of the sage Sharabhang and the great soul Shuka, a man never falls into misfortune and purifies his lineage. ॥ 42॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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