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mahabharat 3.85.31h: यदि कोई व्यक्ति जो सच्चा ब्राह्मण नहीं है, वहाँ गायत्री मंत्र का जाप करता है, तो वह मंत्र वहीं लुप्त हो जाता है; अर्थात् वह उसे भूल जाता है ॥30 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य  »  श्लोक 31h
 
 
श्लोक  3.85.31h 
अब्राह्मणस्य सावित्रीं पठतस्तु प्रणश्यति।
 
 
अनुवाद
यदि कोई व्यक्ति जो सच्चा ब्राह्मण नहीं है, वहाँ गायत्री मंत्र का जाप करता है, तो वह मंत्र वहीं लुप्त हो जाता है; अर्थात् वह उसे भूल जाता है ॥30 1/2॥
 
If a person who is not a true Brahmin recites the Gayatri Mantra there, the Mantra vanishes there; that is, he forgets it. ॥ 30 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)