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mahabharat 3.85.31-32h: महाराज! यहाँ ब्रह्मर्षि संवर्त का एक दुर्लभ कुआँ है। इसमें स्नान करने से मनुष्य सुन्दर रूप प्राप्त करता है और सौभाग्यशाली बनता है।   |   mahabharat अध्याय 3.85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य  »  श्लोक 31-32h
 
 
श्लोक  3.85.31-32h 
संवर्तस्य तु विप्रर्षेर्वापीमासाद्य दुर्लभाम्॥ ३१॥
रूपस्य भागी भवति सुभगश्च प्रजापते।
 
 
अनुवाद
महाराज! यहाँ ब्रह्मर्षि संवर्त का एक दुर्लभ कुआँ है। इसमें स्नान करने से मनुष्य सुन्दर रूप प्राप्त करता है और सौभाग्यशाली बनता है।
 
King! There is a rare well of Brahmarishi Samvarta. By taking bath in it, a person gets beautiful beauty and becomes fortunate. 31 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)