श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.85.28 
उष्य द्वादशरात्रं तु पूतात्मा च भवेन्नर:।
तत एव च गायत्र्या: स्थानं त्रैलोक्यपूजितम्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
वहाँ बारह रात्रि निवास करने से मनुष्य का अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है। तीनों लोकों में गायत्री की उपासना वहीं होती है॥28॥
 
By staying there for twelve nights, the conscience of a person becomes pure. That is the place where Gayatri is worshipped in the three worlds.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)