Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.85.132: इसी विषय पर विचार करते हुए धर्मात्मा युधिष्ठिर ने भी अपने निकट रहने वाले महर्षियों से तीर्थयात्रा के महान पुण्य के विषय में अनुरोध किया ॥132॥   |   mahabharat अध्याय 3.85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य  »  श्लोक 132
 
 
श्लोक  3.85.132 
युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा तमेवार्थं विचिन्तयन्।
तीर्थयात्राश्रितं पुण्यमृषीणां प्रत्यवेदयत्॥ १३२॥
 
 
अनुवाद
इसी विषय पर विचार करते हुए धर्मात्मा युधिष्ठिर ने भी अपने निकट रहने वाले महर्षियों से तीर्थयात्रा के महान पुण्य के विषय में अनुरोध किया ॥132॥
 
Thinking about the same issue, the virtuous Yudhishthir also requested the great sages living near him about the great virtue of pilgrimage. 132॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि पुलस्त्यतीर्थयात्रायां नारदवाक्ये पञ्चाशीतितमोऽध्याय:॥ ८५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें महर्षि पुलस्त्यकी तीर्थयात्राके सम्बन्धमें नारदवाक्यविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)