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वैशम्पायन उवाच
एवमाश्वास्य राजानं नारदो भगवानृषि:।
अनुज्ञाप्य महाराज तत्रैवान्तरधीयत॥ १३१॥
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं: महाराज जनमेजय! नारद मुनि राजा युधिष्ठिर को इस प्रकार आश्वस्त करके और उनकी अनुमति लेकर वहाँ से अन्तर्धान हो गये।
Vaishmpayana says: - Maharaja Janamejaya! The sage Narada having thus assured King Yudhishthira and taking his permission disappeared from there itself.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥