श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य  »  श्लोक 112
 
 
श्लोक  3.85.112 
नारद उवाच
एवमुक्त्वाभ्यनुज्ञाय पुलस्त्यो भगवानृषि:।
प्रीत: प्रीतेन मनसा तत्रैवान्तरधीयत॥ ११२॥
 
 
अनुवाद
नारदजी कहते हैं - युधिष्ठिर ! ऐसा कहकर और भीष्मजी से अनुमति लेकर प्रसन्नचित्त होकर पुलस्त्य मुनि वहाँ से अन्तर्धान हो गए ॥112॥
 
Narada says - Yudhishthira! Having said this and taken permission from Bhishma, the pleased sage Pulastya disappeared from there with a happy mind. ॥ 112॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd