श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 84: नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा  »  श्लोक 98
 
 
श्लोक  3.84.98 
तत: फल्गुं व्रजेद् राजंस्तीर्थसेवी नराधिप।
अश्वमेधमवाप्नोति सिद्धिं च महतीं व्रजेत्॥ ९८॥
 
 
अनुवाद
राजन! नरेश्वर! तत्पश्चात तीर्थ-सेवक मनुष्य फल्गुतीर्थ को जाता है। वहाँ जाकर उसे अश्वमेध्ययज्ञ का फल प्राप्त होता है और महान् सिद्धि प्राप्त होती है ॥98॥
 
Rajan! Nareshwar! Thereafter, the pilgrim-serving human goes to Falgutirtha. By going there he gets the results of Ashwamedhyayagya and attains great success. 98॥
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