श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 84: नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा  »  श्लोक 88-89
 
 
श्लोक  3.84.88-89 
तत्र चिह्नं महद् राजन्नद्यापि सुमहद् भृशम्॥ ८८॥
कपिलाया: सवत्सायाश्चरन्त्या: पर्वते कृतम्।
सवत्साया: पदानि स्म दृश्यन्तेऽद्यापि भारत॥ ८९॥
 
 
अनुवाद
राजन! एक पर्वत पर बछड़े सहित कपिला गाय का चरने का एक विशाल पदचिह्न आज भी विद्यमान है। भरतनंदन! बछड़े सहित उस गाय के पदचिह्न आज भी वहाँ विद्यमान हैं। 88-89॥
 
Rajan! There is still a huge footprint of Kapila cow along with its calf grazing on a mountain. Bharatnandan! The footprints of that cow along with its calf are still seen there. 88-89॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)