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श्लोक 3.84.87-88h  |
ततो गच्छेत राजेन्द्र धेनुकं लोकविश्रुतम्।
एकरात्रोषितो राजन् प्रयच्छेत् तिलधेनुकाम्॥ ८७॥
सर्वपापविशुद्धात्मा सोमलोकं व्रजेद् ध्रुवम्। |
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| अनुवाद |
| राजेन्द्र! वहाँ से प्रसिद्ध धेनुतीर्थ जाओ। महाराज! वहाँ एक रात्रि ठहरो और तिलकी गौ दान करो। इससे तीर्थयात्री सब पापों से मुक्त होकर अवश्य ही सोमलोक को जाएगा। 87 1/2॥ |
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| Rajendra! From there go to the famous Dhenutirtha. Maharaj! Stay there for one night and donate Tilki cow.* By this, the pilgrim will be freed from all sins and will surely go to Somlok. 87 1/2॥ |
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