श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 84: नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा  »  श्लोक 80-81
 
 
श्लोक  3.84.80-81 
मार्कण्डेयस्य राजेन्द्र तीर्थमासाद्य दुर्लभम्॥ ८०॥
गोमतीगङ्गयोश्चैव संगमे लोकविश्रुते।
अग्निष्टोममवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत्॥ ८१॥
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! गोमती और गंगा के प्रसिद्ध संगम के निकट मार्कण्डेयजी का दुर्लभ तीर्थ है। वहाँ जाने से मनुष्य अग्निष्टोमयाग का फल प्राप्त करता है और अपने कुल का उद्धार करता है। 80-81॥
 
Rajendra! There is a rare pilgrimage site of Markandeyaji near the famous confluence of Gomti and Ganga. By going there, a person gets the fruits of Agnishtomayagya and saves his family. 80-81॥
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