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mahabharat 3.84.63-64: भरतश्रेष्ठ! वह अपने कुल की सात पीढ़ियों का भी उद्धार कर देता है। जो नैमिष में व्रत करके प्राण त्याग करता है, वह समस्त लोकों में सुख भोगता है; ऐसा विद्वान पुरुष कहते हैं। श्रेष्ठ! नैमिषतीर्थ नित्य, पवित्र और पुण्यप्रद है। 63-64॥   |   mahabharat अध्याय 3.84: नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 84: नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा  »  श्लोक 63-64
 
 
श्लोक  3.84.63-64 
पुनात्यासप्तमं चैव कुलं भरतसत्तम।
यस्त्यजेन्नैमिषे प्राणानुपवासपरायण:॥ ६३॥
स मोदेत् सर्वलोकेषु एवमाहुर्मनीषिण:।
नित्यं मेध्यं च पुण्यं च नैमिषं नृपसत्तम॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
भरतश्रेष्ठ! वह अपने कुल की सात पीढ़ियों का भी उद्धार कर देता है। जो नैमिष में व्रत करके प्राण त्याग करता है, वह समस्त लोकों में सुख भोगता है; ऐसा विद्वान पुरुष कहते हैं। श्रेष्ठ! नैमिषतीर्थ नित्य, पवित्र और पुण्यप्रद है। 63-64॥
 
Bharatshrestha! He also saves seven generations of his clan. He who sacrifices his life by fasting in Naimisha, experiences happiness in all the worlds; This is what wise men say. The best! Naimishtirtha is daily, sacred and virtuous. 63-64॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)