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श्लोक 3.84.60  |
नैमिषं मृगयानस्य पापस्यार्धं प्रणश्यति।
प्रविष्टमात्रस्तु नर: सर्वपापै: प्रमुच्यते॥ ६०॥ |
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| अनुवाद |
| जो मनुष्य नैमिषारण्य की खोज करता है, उसके आधे पाप तुरन्त ही नष्ट हो जाते हैं और उसमें प्रवेश करते ही वह सब पापों से मुक्त हो जाता है ॥60॥ |
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| Half of the sins of the person who searches for Naimisharanya are destroyed instantly and on entering it he is freed from all his sins. ॥ 60॥ |
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