श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 84: नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  3.84.45 
दर्वीसंक्रमणं प्राप्य तीर्थं त्रैलोक्यपूजितम्।
अश्वमेधमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
त्रिभुवन-पूजित दर्विसंक्रमण नामक तीर्थस्थान में जाकर तीर्थयात्री अश्वमेध्य यज्ञ का फल प्राप्त करता है और स्वर्ग को जाता है ॥45॥
 
By going to the Tribhuvan-worshipped pilgrimage place called Darvisankraman, the pilgrim gets the fruits of Ashwamedhya Yagya and goes to heaven. 45॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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