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श्लोक 3.84.45  |
दर्वीसंक्रमणं प्राप्य तीर्थं त्रैलोक्यपूजितम्।
अश्वमेधमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति॥ ४५॥ |
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| अनुवाद |
| त्रिभुवन-पूजित दर्विसंक्रमण नामक तीर्थस्थान में जाकर तीर्थयात्री अश्वमेध्य यज्ञ का फल प्राप्त करता है और स्वर्ग को जाता है ॥45॥ |
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| By going to the Tribhuvan-worshipped pilgrimage place called Darvisankraman, the pilgrim gets the fruits of Ashwamedhya Yagya and goes to heaven. 45॥ |
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