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mahabharat 3.84.40: नरेन्द्र! तत्पश्चात् तीर्थ-सेवक मनुष्य कुब्जाम्रक-तीर्थ में जाता है। वहाँ उसे सहस्र गोदान का फल प्राप्त होता है और अन्त में वह स्वर्ग को जाता है। 40॥   |   mahabharat अध्याय 3.84: नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 84: नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  3.84.40 
तत: कुब्जाम्रकं गच्छेत् तीर्थसेवी नराधिप।
गोसहस्रमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
नरेन्द्र! तत्पश्चात् तीर्थ-सेवक मनुष्य कुब्जाम्रक-तीर्थ में जाता है। वहाँ उसे सहस्र गोदान का फल प्राप्त होता है और अन्त में वह स्वर्ग को जाता है। 40॥
 
Narendra! After that, the pilgrim-serving human goes to Kubjamrak-tirtha. There he gets the reward of thousands of Godans and finally he goes to heaven. 40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)