श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 84: नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा  »  श्लोक 20-23h
 
 
श्लोक  3.84.20-23h 
उक्तश्च त्रिपुरघ्नेन परितुष्टेन भारत।
अपि च त्वं प्रियतरो लोके कृष्ण भविष्यसि॥ २०॥
त्वन्मुखं च जगत् सर्वं भविष्यति न संशय:।
तत्राभिगम्य राजेन्द्र पूजयित्वा वृषध्वजम्॥ २१॥
अश्वमेधमवाप्नोति गाणपत्यं च विन्दति।
धूमावतीं ततो गच्छेत् त्रिरात्रोपोषितो नर:॥ २२॥
मनसा प्रार्थितान् कामाँल्लभते नात्र संशय:।
 
 
अनुवाद
उस समय संतुष्ट त्रिपुरारी शिव ने श्रीविष्णु से कहा - 'श्रीकृष्ण! इस लोक में आप मुझे अत्यंत प्रिय होंगे। इसमें संदेह नहीं कि संसार में सर्वत्र आपका आधिपत्य होगा।' राजेन्द्र! उस तीर्थ में जाकर भगवान शंकर का पूजन करने से मनुष्य अश्वमेधयज्ञ का फल प्राप्त करता है और गणपति पद को प्राप्त करता है। वहाँ से धूमावती तीर्थ में जाकर तीन रात्रि तक व्रत करना चाहिए। इससे उसे निःसंदेह अपनी अभीष्ट कामनाओं की प्राप्ति होती है। 20-22 1/2
 
India At that time, a satisfied Tripurari Shiva said to Shri Vishnu - 'Shri Krishna! You will be very dear to me in this world. There is no doubt that you will have supremacy everywhere in the world.' Rajendra! By going to that pilgrimage and worshiping Lord Shankar, a person gets the results of Ashwamedhyayagya and attains the status of Ganapati. From there one should go to Dhumavati Tirtha and fast for three nights. With this he undoubtedly achieves his desired desires. 20-22 1/2
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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