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श्लोक 3.84.162  |
धर्मतीर्थं समासाद्य पुण्यं ब्रह्मर्षिसेवितम्।
वाजपेयमवाप्नोति विमानस्थश्च पूज्यते॥ १६२॥ |
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| अनुवाद |
| जो मनुष्य परम पवित्र ब्रह्मर्षियों द्वारा सेवित धार्मिक तीर्थस्थान में जाकर स्नान करता है, वह वाजपेय यज्ञ का फल पाता है और विमान पर बैठकर पूजा जाता है ॥162॥ |
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| A person who goes to the religious pilgrimage site served by the most holy Brahmarshi and takes bath gets the fruits of Vajpayee Yagya and is worshiped while sitting on a plane. 162॥ |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि पुलस्त्यतीर्थयात्रायां चतुरशीतितमोऽध्याय:॥ ८४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें पुलस्त्यकी तीर्थयात्रासे सम्बन्ध रखनेवाला चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८४॥
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