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श्लोक 3.84.155  |
नन्दिन्यां च समासाद्य कूपं देवनिषेवितम्।
नरमेधस्य यत् पुण्यं तदाप्नोति नराधिप॥ १५५॥ |
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| अनुवाद |
| नन्दिनीतीर्थ में देवताओं द्वारा सेवित एक कुआँ है । नरेश्वर ! वहाँ जाकर स्नान करने से मनुष्य को नरमेध्ययज्ञ का पुण्य प्राप्त होता है ॥155॥ |
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| There is a well served by the deities in Nandinitirtha. Nareshwar! By going there and taking bath, a person attains the virtue of Narmedhyajna. 155॥ |
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