श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 84: नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा  »  श्लोक 155
 
 
श्लोक  3.84.155 
नन्दिन्यां च समासाद्य कूपं देवनिषेवितम्।
नरमेधस्य यत् पुण्यं तदाप्नोति नराधिप॥ १५५॥
 
 
अनुवाद
नन्दिनीतीर्थ में देवताओं द्वारा सेवित एक कुआँ है । नरेश्वर ! वहाँ जाकर स्नान करने से मनुष्य को नरमेध्ययज्ञ का पुण्य प्राप्त होता है ॥155॥
 
There is a well served by the deities in Nandinitirtha. Nareshwar! By going there and taking bath, a person attains the virtue of Narmedhyajna. 155॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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