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श्लोक 3.84.152  |
समारुह्य नरश्रेष्ठ स्तनकुण्डेषु संविशेत्।
स्तनकुण्डमुपस्पृश्य वाजपेयफलं लभेत्॥ १५२॥ |
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| अनुवाद |
| हे पुरुषश्रेष्ठ! उस शिखर पर चढ़कर मनुष्य वक्षस्थल में स्नान करो। वक्षस्थल में ध्यान करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है ॥152॥ |
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| Male best! Climb that peak and take bath in the human breast pond. By observing the meditation in the chest, one gets the result of Vajpayya Yagya. 152॥ |
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