श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 84: नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा  »  श्लोक 145-146h
 
 
श्लोक  3.84.145-146h 
कुमारमभिगम्याथ वीराश्रमनिवासिनम्॥ १४५॥
अश्वमेधमवाप्नोति नरो नास्त्यत्र संशय:।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् वीरआश्रमवासी कुमार कार्तिकेय के पास जाकर मनुष्य अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है, इसमें कोई संदेह नहीं है ॥145 1/2॥
 
Thereafter going to Kumar Kartikeya, the resident of Veerashram, one obtains the fruits of the Ashwamedha Yagna, there is no doubt about this. ॥145 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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