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mahabharat 3.84.144-145h: ऐसा करने से एक मास में ही अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ महाह्रद ​​में स्नान करता है, उसे कभी भी दुर्भाग्य का सामना नहीं करना पड़ता और उसे बहुत सा स्वर्ण प्राप्त होता है।   |   mahabharat अध्याय 3.84: नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 84: नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा  »  श्लोक 144-145h
 
 
श्लोक  3.84.144-145h 
अश्वमेधस्य यत् पुण्यं तन्मासेनाधिगच्छति।
सर्वतीर्थवरे चैव यो वसेत महाह्रदे॥ १४४॥
न दुर्गतिमवाप्नोति विन्देद् बहु सुवर्णकम्।
 
 
अनुवाद
ऐसा करने से एक मास में ही अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ महाह्रद ​​में स्नान करता है, उसे कभी भी दुर्भाग्य का सामना नहीं करना पड़ता और उसे बहुत सा स्वर्ण प्राप्त होता है।
 
By doing this, one can attain the merits of performing Ashwamedha Yagna in just one month. He who bathes in Mahahrad, the best of all the holy places, never faces a bad fate and obtains a lot of gold. 144 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)