श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 84: नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा  »  श्लोक 127-128
 
 
श्लोक  3.84.127-128 
तत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र न दुर्गतिमवाप्नुयात्।
अभिगम्य महादेवं वरदं रुद्रमव्ययम्॥ १२७॥
विराजति यथा सोमो मेघैर्मुक्तो नराधिप।
जातिस्मरमुपस्पृश्य शुचि: प्रयतमानस:॥ १२८॥
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! उसमें निवास करने से मनुष्य कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता। सबको वर देने वाले अविनाशी महादेव रुद्र के समीप जाकर मनुष्य बादलों के आवरण से मुक्त हुए चन्द्रमा के समान शोभायमान हो जाता है। नरेश्वर! वहाँ जातिस्मृति और तीर्थ है; जिसमें स्नान करने से मनुष्य शुद्ध और मन से पवित्र हो जाता है। अर्थात् उसका तन-मन पवित्र हो जाता है। 127-128॥
 
Rajendra! By residing in it, man never falls into misery. By going near Rudra, the immortal Mahadev who gives boons to all, man becomes beautiful like the moon freed from the cover of clouds. Nareshwar! There is caste memory and pilgrimage; By taking bath in which a person becomes pure and pure in mind. That is, his body and mind are purified. 127-128॥
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