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श्लोक 3.84.120-122h  |
तत्र कोटिस्तु तीर्थानां विश्रुता भरतर्षभ।
कूर्मरूपेण राजेन्द्र ह्यसुरेण दुरात्मना॥ १२०॥
ह्रियमाणा हृता राजन् विष्णुना प्रभविष्णुना।
तत्राभिषेकं कुर्वीत तीर्थकोटॺां युधिष्ठिर॥ १२१॥
पुण्डरीकमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति। |
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| अनुवाद |
| भरतकुलतिलक! वहाँ एक प्रसिद्ध तीर्थयात्रियों के समूह को कूर्म रूपी दुष्ट राक्षस हर ले गया था। राजन! यह देखकर सर्वशक्तिमान भगवान विष्णु ने उस तीर्थयात्री की रक्षा की। युधिष्ठिर! उस तीर्थकोटि में स्नान करना चाहिए। जो यात्री ऐसा करता है, उसे पुण्डरीकयज्ञ का फल मिलता है और वह विष्णुलोक को जाता है। 120-121 1/2॥ |
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| Bharatkulatilak! There a famous group of pilgrims was taken away by an evil demon in the form of Kurma. Rajan! Seeing this, Almighty Lord Vishnu saved that pilgrim. Yudhisthira! One should take bath there in that Tirthankoti. The traveler who does this gets the fruits of Pundarikayagya and goes to Vishnuloka. 120-121 1/2॥ |
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