vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 84: नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा
»
श्लोक 118
श्लोक
3.84.118
दिवौकसां पुष्करिणीं समासाद्य नराधिप।
न दुर्गतिमवाप्नोति वाजिमेधं च विन्दति॥ ११८॥
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! देवपुष्करिणी में जाने के बाद मनुष्य कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता तथा अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥118॥
O lord of men! After going to Devapushkarini, a human never falls into misfortune and attains the fruits of performing Ashwamedha Yagna. ॥ 118॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×