श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 84: नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा  »  श्लोक 108-109
 
 
श्लोक  3.84.108-109 
ततो गच्छेत ब्रह्मर्षेर्गौतमस्य वनं प्रियम्॥ १०८॥
अहल्याया ह्रदे स्नात्वा व्रजेत परमां गतिम्।
अभिगम्याश्रमं राजन् विन्दते श्रियमात्मन:॥ १०९॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् ब्रह्मर्षि गौतम के प्रिय वन में जाना चाहिए। वहाँ अहिल्या कुण्ड में स्नान करने से मनुष्य परम मोक्ष को प्राप्त होता है। हे राजन! गौतम के आश्रम में जाकर मनुष्य लक्ष्मी प्राप्त करता है॥ 108-109॥
 
After that one should visit the favourite forest of Brahmarshi Gautam. By taking bath in Ahalya Kund there, a man attains the ultimate salvation. O King! By going to Gautam's hermitage, a man obtains Lakshmi for himself.॥ 108-109॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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